अध्यात्म और शिक्षा







आध्यात्मिकता और शिक्षा को साथ लेकर अनेकों धर्म और कर्म संबंधी उलझने सुलझाई जा सकती है।


अध्यात्म और शिक्षा की प्रथम आवश्यकता



  •  आज  के समय में शिक्षा केवल एक रोजी रोटी कमाने के उद्देश्य से प्राप्त की जा रहा है।
  • और पहले के युगों में शिक्षा का उपयोग हमारे शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करने के लिए किया जाता था। किन्तु विचारणीय विषय तो यह है कि अब पहले से अधिक शिक्षित समाज है परन्तु उनसे भी अधिक बहकावे में आने लगा है। किस तरह से आए जानते है
  • पहले शिक्षा को शास्त्रीय ज्ञान उद्देश्य से गुरुकुल में प्राप्त करते थे। जिसका लाभ केवल चन्द लोगो को जो समाज में श्रेष्ठ माने जाते हैं उन्हीं को प्राप्त होता था।
  • सभी केवल अपने शास्त्र में वर्णित भक्ति मार्ग अपनाते थे अपनी मनमानी से भक्ति नहीं करते थे
  • आज शिक्षा को घर घर तक पहुंचाया जा रहा है बच्चा बच्चा शिक्षित हो रहा सभी सभी अपना घरेलू कार्य निपटाने और कमाई के स्रोत के रूप में इसका प्रयोग कर रहे हैं।
  • किन्तु हम शिक्षित होकर भी उन पर आंख मूंद कर विश्वास कर बैठते हैं जिन्होने कभी अपने शास्त्र को नहीं खोला और इन्हीं पर अंध विश्वास कर बैठते हैं।
  • अपनी शिक्षा का उपयोग हमे अपने शास्त्र को समझने में भी करना आवश्यक है।

  • आज के युग में केवल संत रामपाल जी महाराज जी ही पूर्ण गुरु है जो हमारे सभी शास्त्र चाहे वो किसी भी धर्म हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई से हो सभी को खोलकर उनके आधार पर सही भक्ति मार्ग बता रहे है, इनके द्वारा बताया गया ज्ञान सत प्रतिशत सही है ।


गीता अध्याय 16 श्लोक 23 और 24 के अनुसार जो शास्त्र विधि को त्याग कर मनमाना आचरण करते हैं उन्हें कोई लाभ नहीं मिल सकता।


गुरु के बिना ज्ञान कि प्राप्ति असंभव है और गुरु भी पूरा होना अनिवार्य है ।
पूरे गुरु को गीता अध्याय 4 श्लोक 34 के अनुसार तत्वदर्शी संत कहते हैं जिसकी पहचान गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में बताई गई है।






"जो संत उल्टे लटके संसार रूपी वृक्ष को सभी विभागों (जड़ से पत्तो) सहित बता देगा सह वेद विद अर्थात् वह वेद का ज्ञाता हैं वहीं तत्वदर्शी संत है।

परमेश्वर कबीर साहेब जी ने 600 वर्ष पूर्व इस उल्टे लटके संसार रूपी वृक्ष का रहस्य बता दिया था

कबीर अक्षर पुरुष एक पेड़ है,
                                       निरंजन वाकी डार।
तीनो देवा शाखा है और,
                               पात रूप संसार।।




हम केवल एक धर्म "मानव धर्म" को लेकर ही आध्यात्मिकता की राह पर चलने लगे तो शायद हमारा सफ़र करना आसान हो जाएगा। 
जब तक हम सब धर्म एक ही राह पर एक दिशा में एक नज़रिए से नहीं सोचेंगे तब तक अध्यात्म और शिक्षा को अपने अपने क्षैत्र तक ही सीमित रखा जाएगा।

 हमे सभी आध्यात्मिक पुस्तके पढ़नी चाहिए चाहे वो हिन्दू धर्म से हो मुस्लिम से हो, बाइबल या फिर गुरु ग्रंथ साहिब से हो ! आइए आज से ही शुरुआत करते एक ही दिशा में आध्यात्मिक ज्ञान की क्रांति लाने की पढ़िए एक बहुत ही अतुल्य अनमोल पुस्तक" ज्ञान गंगा" एक ऐसी पुस्तक जो हमारे सभी संकोच मिटा देगी अर्थात् कौन भगवान है कहां रहता है कैसे मिलता है और इसका प्रमाण कहां है।


आइए हम भी अब अपने शिक्षित होने का फायदा अध्यात्म और शिक्षा के क्षैत्र से भी उठाएं।
अपने शास्त्र का सही विश्लेषण करे।


यदि हम भी हम भी अपने शास्त्र के आधार पर ही भक्ति करेंगे तो इससे सभी लाभ संभव है जो हम यकीन भी नहीं कर सकते।



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